“उड़ान”: बेटियों के हौसलों को पंख और समाज की संकीर्ण सोच पर करारा प्रहार

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लेखिका ने रस्सी से फाँसी लगाने के बजाय उसका झूला बना देने का जो प्रतीक चुना है, वह अद्भुत है। यह दृश्य निराशा पर उम्मीद की, और हार पर संघर्ष की एक शानदार जीत है।

गाँवों और कस्बों की संकरी गलियों में आज भी लड़कियों की शिक्षा, उनकी आज़ादी और उनके सपनों को शक के दायरे में रखा जाता है। ऐसे रूढ़िवादी दौर में, नवोदित लेखिका महविश जबीन द्वारा रचित कहानी “उड़ान” महज़ एक कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज के दोहरे चरित्र के सामने रखा गया एक बेबाक आईना है। यह मर्मस्पर्शी कहानी हाल ही में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन National Council for Promotion of Urdu Language की प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका “ख़्वातीन दुनिया” में प्रकाशित हुई है।

संघर्ष, रूढ़िवादिता और ‘इज़्ज़त’ की दीवारें

कहानी की नायिका ‘रिया’ एक छोटे से गाँव की बेहद समझदार और मुखर लड़की है। वह पढ़ना चाहती है, आगे बढ़ना चाहती है, लेकिन उसका समाज लड़कियों की शिक्षा को उनका ‘अधिकार’ नहीं, बल्कि एक ‘एहसान’ मानता है। रूढ़िवादी पारिवारिक सोच, पड़ोसियों के तीखे ताने और “इज़्ज़त” के नाम पर खड़ी की गई बंदिशों की दीवारें हर कदम पर उसका रास्ता रोकती हैं।

संवादों की धार और प्रतीकों का अनूठा प्रयोग

लेखिका ने रिया के इस मानसिक और सामाजिक संघर्ष को बेहद सरल लेकिन बेहद तीखे संवादों के ज़रिए उकेरा है। कहानी का एक संवाद इस कड़वी सच्चाई को बखूबी बयां करता है:

“बेटे दिए की तरह होते हैं… और बेटियाँ मोमबत्ती।”

यह पंक्ति उस पुरुषसत्तात्मक मानसिकता पर सीधा प्रहार करती है जो आज भी हमारे समाज की रगों में दौड़ रही है।

कहानी का सबसे सशक्त और जादुई हिस्सा इसका क्लाइमेक्स (अंतिम दृश्य) है। जहाँ अमूमन कहानियों में हताशा को आत्महत्या से जोड़ दिया जाता है, वहीं लेखिका ने रस्सी से फाँसी लगाने के बजाय उसका झूला बना देने का जो प्रतीक चुना है, वह अद्भुत है। यह दृश्य निराशा पर उम्मीद की, और हार पर संघर्ष की एक शानदार जीत है।

रिया का यह उद्घोष आज की हर उस लड़की की गूँज बन जाता है जो बेड़ियों को तोड़कर आसमान छूना चाहती है:

“मुझे जीना है। उड़ना है। कुछ बनना है — ऐसा, जिससे सबकी सोच बदल सके।”

कसौटी चरित्र की और सवाल सोच का

आज जब देश में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और महिला सुरक्षा पर बड़े-बड़े मंचों से विमर्श हो रहा है, तब “उड़ान” जैसी कहानियाँ ज़मीनी हकीकत बयां करती हैं। लेखिका यह साफ़ करती हैं कि समस्या सिर्फ संसाधनों या स्कूलों की कमी की नहीं है, बल्कि समस्या ‘सोच’ की है।

ग्रामीण परिवेश में आज भी कई लड़कियाँ सिर्फ इसलिए पढ़ाई छोड़ देती हैं क्योंकि समाज उनके चरित्र पर उँगली उठाने लगता है। सोशल मीडिया और अफवाहों के इस दौर में, लड़कियों को योग्यता से पहले “किरदार” की अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है। कहानी इसी कड़वे सच की परतें उधेड़ती है।

निराशा नहीं, उम्मीद का दस्तावेज़

“उड़ान” की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यह अंततः एक सकारात्मक संदेश छोड़ती है। यह टूटने की नहीं, जुटने की कहानी है; यह हार मानने की नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से लड़ने की दास्तान है। लेखिका ने बेहद संवेदनशीलता से यह साबित किया है कि बेटियाँ बोझ नहीं, बल्कि अनंत संभावनाओं का नाम हैं।

बिहार के छोटे से गाँव से राष्ट्रीय पटल तक

कम उम्र में इतनी गहरी सामाजिक समझ और ऐसा परिपक्व लेखन यह भरोसा दिलाता है कि हमारी नई पीढ़ी समाज की कुरीतियों को बदलने के लिए तैयार है। बिहार के कटिहार ज़िले के एक छोटे से गाँव ‘बेनीबाड़ी’ की पृष्ठभूमि से निकलकर महविश जबीन ने जिस तरह इस राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में अपनी जगह बनाई है, वह अत्यंत सराहनीय और प्रेरणादायक है।

“उड़ान” केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि सोए हुए समाज को जगाने वाला एक वैचारिक दस्तावेज़ है। यह पाठकों के ज़ेहन में सवाल छोड़ जाती है—और यकीनन, किसी भी जीवंत साहित्य की सबसे बड़ी सफलता यही है।

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