अलीगढ़: AMU में उर्दू पुस्तक मेले की भव्य शुरुआत, किताब और भाषा संस्कृति को मिला नया आयाम

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अलीगढ़/नई दिल्ली: राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद(NCPUL) के तत्वावधान में अलीगढ़ उर्दू पुस्तक मेले का उद्घाटन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय(AMU) के कल्चरल एजुकेशन सेंटर में हुआ। 22 नवंबर से 30 नवंबर तक चलने वाले इस पुस्तक मेले का एएमयू की वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर नायमा ख़ातून ने फीता काटकर औपचारिक उद्घाटन किया।

राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के निदेशक डॉ. शम्स इक़बाल ने उद्घाटन सत्र में स्वागत भाषण देते हुए कहा कि अलीगढ़ उर्दू पुस्तक मेला नई पीढ़ी में पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और इस तरह की कोशिशें लगातार जारी रहनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि उर्दू भाषा का अलीगढ़ से बहुत गहरा रिश्ता है क्योंकि यहां हर दौर में उर्दू के विख्यात लेखक, कवि और शोधकर्ता पैदा हुए हैं, जिन्होंने उर्दू के साहित्यिक और वैज्ञानिक ख़ज़ाने में अमूल्य योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि इस मेले का उद्देश्य उर्दू पुस्तकों का प्रचार-प्रसार, भाषा और साहित्य से जुड़े युवाओं को प्रोत्साहन देना और नई पीढ़ी में पठन-पाठन की आदत को मजबूत करना है। उन्होंने बताया कि नौ दिनों के इस पुस्तक मेले के दौरान विभिन्न शैक्षणिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे जिनमें अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ अपने विचार प्रकट करेंगे।

डॉ. शम्स इक़बाल ने कहा कि इस पुस्तक मेले की वास्तविक सफलता तभी होगी जब लोग इसमें आकर उर्दू भाषा और उसकी संस्कृति से आत्मीय लगाव महसूस करें और इस वातावरण से प्रेरणा पाकर नए उर्दू पाठक पैदा हों।

एएमयू की वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर नायमा ख़ातून ने अपने संबोधन में कहा कि अलीगढ़ उर्दू पुस्तक मेला हमारे लिए एक शैक्षणिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक उत्सव की तरह है। उन्होंने किताब की अहमियत पर ज़ोर देते हुए कहा कि किताबें हमारी सोच और सामाजिक चेतना को ऊंचाई देती हैं। उर्दू के संबंध में उन्होंने कहा कि उर्दू ने हर दौर में अपना सम्मान बनाए रखा है और बड़े-बड़े कवियों व लेखकों ने इसे अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। उन्होंने छात्रों से विशेष आग्रह किया कि वे पुस्तक मेले में आएं और अधिक से अधिक पुस्तकें खरीदें।

पद्मश्री प्रोफ़ेसर सैयद ज़िल्लुर्रहमान ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि अलीगढ़ एकमात्र ऐसा संस्थान है जहां विभिन्न विषयों के विद्वानों ने उर्दू में अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने श्रोताओं को सलाह दी कि जब आप किताब से प्रेम करेंगे तो किताब भी आपसे प्रेम करेगी। किताब पढ़ें, किताब से लगाव रखें — इसके बिना ज्ञान संभव नहीं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मौजूदा दौर में उर्दू पाठकीयता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है और मातृभाषा से प्रेम का तकाज़ा है कि हर व्यक्ति उर्दू सीखे।

मुख्य वक्तव्य प्रसिद्ध कथाकार सैयद मोहम्मद अशरफ़ ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि पुस्तकों को जीवन में स्थान दीजिए क्योंकि किताबें हमें सोचने-समझने और गहराई में विचार करने की क्षमता देती हैं। उन्होंने कहा कि टेक्नॉलजी अपनी जगह अहम है, लेकिन किताब का स्पर्श, उसकी खुशबू और उसका असर बिल्कुल अनोखा होता है। उन्होंने युवाओं को सुझाव दिया कि अपने घर में एक छोटी-सी लाइब्रेरी जरूर बनाएं। जैसे ही किताबें आपके जीवन में आएंगी, आपके सोचने के अंदाज़ में ठहराव और परिपक्वता आ जाएगी।

प्रोफ़ेसर शाफ़े क़ुदवई (मानद निदेशक, सर सय्यद अकादमी) ने अपनी बात रखते हुए कहा कि उन्हें अलीगढ़ में लगभग चालीस वर्ष हो गए हैं, लेकिन उन्होंने नौ दिनों तक चलने वाला इतना व्यापक और समृद्ध साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन कभी नहीं देखा। उन्होंने कहा कि हम डिजिटल युग में जी रहे हैं जहां पुस्तकों से लगाव कम होता जा रहा है, जबकि किताबें हमारी कल्पनाशक्ति और वैचारिक क्षमता को विकसित करती हैं। उन्होंने कहा कि किताब की उपयोगिता कल भी सिद्ध थी, आज भी है और हमेशा बनी रहेगी।

धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मोहम्मद नवीद ख़ान (कोऑर्डिनेटर, कल्चरल एजुकेशन सेंटर, एएमयू) ने किया और संचालन के फ़र्ज़ डॉ. फ़ैज़ानुल हक़ ने निभाए।

इस अवसर पर परिषद द्वारा प्रकाशित पाँच बाल पुस्तकों — ‘फूली हुई लोमड़ी’ (ग़ज़नफ़र), ‘हैरतअंगेज़ कारनामा’ (नायमा जाफ़री पाशा), ‘प्रीम दीवानी मीरा’ (सरवत ख़ान), ‘रोबोट’ (इक़बाल बर्क़ी) और ‘पालकी’ (शाह ताज ख़ान) — का भी लोकार्पण किया गया।

उद्घाटन कार्यक्रम के बाद दिन का दूसरा कार्यक्रम ‘आईना है रूबरू’ (मेरा रचनात्मक सफ़र: लेखकों से मुलाक़ात) था, जिसमें प्रोफ़ेसर तारिक छतारी, प्रोफ़ेसर ग़ज़नफ़र और डॉ. नायमा जाफ़री पाशा ने अपने रचनात्मक अनुभव साझा किए। इस सत्र के मोडरेटर डॉ. तौसीफ़ बरेलवी थे।

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