“रहें ना रहें हम, महका करेंगे…बन के कली, बन के सबा, बाग़-ए-वफ़ा में”
हिंदी सिनेमा का वो ‘सुनहरा दौर’… जिसमें हुनरमंद और बुलंद आवाज़ों की कमी नहीं थी। प्लेबैक गायकी अपने उरूज (शिखर) पर थी। लेकिन इन सबके बीच एक आवाज़ ऐसी भी थी, जो बेहद मीठी, सादी और सुरों की गहराई लिए हुए थी। यह आवाज़ थी—सुमन कल्याणपुर की।
सादगी, पाकीज़गी और वो ‘अमर तुलना’
1950 के दशक की शुरुआत में जब उन्होंने प्लेबैक गायन की दुनिया में क़दम रखा, तो उनकी आवाज़ इतनी पाकीज़ा और शास्त्रीय सुरों में पगी हुई थी कि सुनने वाले और संगीतकार, दोनों ही फ़ौरन उनके सहर (जादू) में खो गए।
लेकिन, उनका यह सफ़र एक ऐसी तुलना का शिकार रहा जिससे बचना नामुमकिन था। उनकी आवाज़ की खनक और तासीर स्वर कोकिला लता मंगेशकर से इस क़दर मिलती थी कि अक्सर लोग धोखा खा जाते थे।
जब रिकॉर्डिंग स्टूडियो के ख़ालीपन को सुरों से भरा
1960 के दशक में जब रॉयल्टी के मशहूर विवाद और कुछ गलतफहमियों की वजह से लता जी कुछ संगीतकारों और साथी गायकों (ख़ासकर मोहम्मद रफ़ी साहब) से दूर हो गई थीं, तब रिकॉर्डिंग स्टूडियो का वो ख़ालीपन सुमन कल्याणपुर ने ही भरा था।
“तुमने पुकारा और हम चले आए रे,
जान हथेली पर ले आए रे….”
मगर उनकी इस शानदार अदायगी ने साबित किया कि वो ख़ुद अपने आप में एक मुकम्मल फ़नकार थीं। दिग्गजों के बीच उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई और यह जता दिया कि उनके सुरों की पुख़्तगी और जज़्बातों की गहराई कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं थी। उन्होंने महज़ एक ख़ाली जगह को नहीं भरा, बल्कि उन धुनों में अपनी रूह फूँक दी जो आज भी अमर हैं।
सुमन जी के कुछ सदाबहार नग्मे
उनकी जादुई आवाज़ ने भारतीय सिनेमा को कई ऐसे गीत दिए जो आज भी गुनगुनाए जाते हैं:
- “ना तुम हमें जानो, ना हम तुम्हें जानें… मगर लगता है कुछ ऐसा, मेरा हमदम मिल गया…”
- “ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे, करना था इनकार मगर इक़रार हम कर बैठे…”
लता जैसी काबिलियत, आशा-गीता जैसी शरारत
सुमन कल्याणपुर जी की आवाज़ में जहाँ एक तरफ लता जी जैसी काबिलियत (कमाल) थी, वहीं दूसरी तरफ आशा भोंसले और गीता दत्त जैसी शरारत और चंचलता भी थी। वे एक साफ़ और रौशन आवाज़ थीं। उन्होंने हर सुर को ऐसे छुआ, जैसे कोई खूबसूरत मुस्कुराहट होंठों से अलग होकर हवा में घुल जाए।
वो लता जी के बराबर नहीं थीं, तो उनसे कम भी नहीं थीं।
कई गीत ऐसे हैं जिनमें आप फ़र्क नहीं कर सकते कि ये लता जी ने गाया है या सुमन कल्याणपुर ने। यहाँ तक कि इंटरनेट पर आज भी कई गीतों के क्रेडिट में दोनों के ही नाम मिलते हैं।

उस्ताद मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा यह कालजयी गीत ज़रूर सुनिए, जो आज सुमन जी की विदाई पर उनके ही सफर की दास्ताँ बयां कर रहा है:
“रहें ना रहें हम, महका करेंगे…
बन के कली, बन के सबा, बाग़-ए-वफ़ा में”
अलविदा सुमन जी! आपकी महक इन सुरों के ज़रिए हमेशा ज़िंदा रहेगी।
नोट- लेखक सिबतैन शाहिदी एक फिल्ममेकर (Filmmaker) और स्क्रीनराइटर (Screenwriter) हैं। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने निजी विचार हैं।
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