भारतीय पत्रकारिता के परिदृश्य में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिनकी पहचान सिर्फ उनके लिखे शब्दों या टीवी स्क्रीन पर दिखने वाले चेहरे तक सीमित नहीं होती, बल्कि उनकी राजनीतिक समझ, ज़मीनी पकड़ और जन-सरोकारों से तय होती है। यूसुफ़ अंसारी ऐसा ही एक विश्वसनीय नाम हैं। लगभग तीन दशकों से अधिक समय तक न्यूज़ रूम की आपाधापी से लेकर सत्ता के गलियारों और चुनावी सरगर्मियों को करीब से देखने के बाद, अब उन्होंने सक्रिय राजनीति के मैदान में एक नई पारी की शुरुआत की है। आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) द्वारा उन्हें ‘राष्ट्रीय प्रवक्ता’ नियुक्त किया जाना केवल एक नई जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि राजनीति में अब अनुभवों की परिपक्वता को तवज्जो दी जा रही है।
यूसुफ़ अंसारी का सफर महज एक पेशा बदलने की कहानी नहीं है। 1992 में ‘बिजनौर टाइम्स’ से शुरू हुई एक साधारण रिपोर्टर की यह यात्रा ज़ी न्यूज़ के राजनीतिक ब्यूरो प्रमुख और चैनल वन के मैनेजिंग एडिटर तक पहुँची। इस दौरान उन्होंने केवल एंकर रूम में बैठकर खबरें नहीं पढ़ीं, बल्कि 2002 का जम्मू-कश्मीर चुनाव हो, इराक युद्ध के दौरान तुर्की सीमा की रिपोर्टिंग हो, कश्मीर का भयावह भूकंप हो या भारत-अमेरिकी परमाणु समझौता—हर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम को ज़मीन पर उतरकर समझा और जनता तक पहुँचाया। देश के शीर्ष नेताओं से तीखे सवाल पूछने वाले एक पत्रकार के पास जब नीति, नीयत और ज़मीनी हकीकत का इतना व्यापक अनुभव हो, तो उसका राजनीति में आना अस्वाभाविक नहीं लगता।
लेकिन सवाल यह उठता है कि पत्रकारिता से राजनीति का यह संक्रमण कितना आसान होगा?
पत्रकारिता का धर्म सवाल पूछना और समस्याओं को उजागर करना है, जबकि राजनीति की मजबूरी उन सवालों के जवाब देना और संगठन की नीतियों का बचाव करना है। यूसुफ़ अंसारी ने लंबे समय तक पसमांदा फ्रंट के ज़रिए पिछड़े और वंचित समाज के हक़ की आवाज़ उठाई है। 2011 में पीस पार्टी के साथ उनका जुड़ाव भी इसी सामाजिक चेतना का हिस्सा था। ऐसे में चंद्रशेखर आज़ाद की अगवाई वाली आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम) का मंच उनके लिए अपनी पुरानी सामाजिक लड़ाई को एक राजनीतिक धार देने का एक बेहतरीन माध्यम बन सकता है।
आज़ाद समाज पार्टी जैसी उभरती हुई राजनीतिक धारा को आज ऐसे चेहरों की सख्त जरूरत है जो केवल नारों तक सीमित न रहें, बल्कि मुद्दों की गहरी समझ, संवैधानिक मर्यादा और संवाद शैली के ज़रिए पार्टी का पक्ष राष्ट्रीय पटल पर रख सकें। यूसुफ़ अंसारी के पास संसद, चुनाव और नीतिगत मामलों का जो विशाल अनुभव है, वह पार्टी के संवाद तंत्र को एक परिपक्व और गंभीर दिशा दे सकता है।
बेशक, पत्रकारिता के बाद राजनीति की राह “फिसलन भरी” और चुनौतियों से भरी होती है। यहाँ केवल मीडिया के सामने अपनी बात रखना ही सब कुछ नहीं होता, बल्कि ज़मीनी राजनीतिक संघर्ष और जन-आकांक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। आने वाला वक्त यह तय करेगा कि यूसुफ़ अंसारी अपनी इस नई भूमिका में कितना सफल होते हैं, लेकिन इतना तय है कि कलम के सिपाही से लेकर एक राजनीतिक दल की आवाज़ बनने तक का यह मोड़, भारतीय मीडिया और राजनीति दोनों के लिए एक देखने लायक सफर होगा।
नोट- लेखक ख़ालिद मुस्तफ़ा एक पत्रकार हैं। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने निजी विचार हैं। ग्लोबलटुडे उसके लिए जिम्मेदार नहीं है।
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