मैनपुरी(सिराज हुसैन): आमतौर पर लोग अपनी समस्याएं लेकर अधिकारियों के दरवाजे पहुंचते हैं, जहां फाइलें और सरकारी प्रक्रियाएं हावी रहती हैं। लेकिन मैनपुरी में एक बेसहारा किशोर की कहानी ने जिलाधिकारी (DM) डॉ. इंद्रमणि त्रिपाठी की संवेदनशीलता और मानवीय कार्यशैली की एक अनूठी नजीर पेश की है।
माता-पिता का साया नहीं, बीमारी का भारी बोझ
पेट की गंभीर बीमारी से पीड़ित एक किशोर मदद की उम्मीद में जिलाधिकारी के पास पहुंचा। उसने बताया कि उसके माता-पिता नहीं हैं और वह एक महंत के आश्रम में रहकर जीवन गुजार रहा है। बीमारी के इलाज के लिए उसे समय-समय पर एक विशेष इंजेक्शन लगना अनिवार्य था, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वह दवा हासिल करने में असमर्थ था।
किशोर की पीड़ा सुनते ही डीएम डॉ. इंद्रमणि त्रिपाठी ने तुरंत मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को निर्देश जारी कर इंजेक्शन की व्यवस्था कराई।
जब दो घंटे बाद दोबारा लौटा किशोर
मदद की यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। लगभग दो घंटे बाद वही किशोर दोबारा जिलाधिकारी के सामने खड़ा था। इस बार चुनौती कुछ और थी। उसने बताया कि इंजेक्शन को खराब होने से बचाने के लिए रेफ्रिजरेटर में रखना बेहद जरूरी है, लेकिन आश्रम में फ्रिज नहीं है। किशोर ने बताया कि उसे करीब ₹4,500 में एक पुराना (सेकंड हैंड) फ्रिज मिल रहा है, पर उसके पास इतने पैसे नहीं हैं।
बिना कागजी कार्रवाई, जेब से दिए पैसे
किशोर की बेबस आंखें और जरूरत देखकर डीएम ने किसी भी सरकारी फंड या प्रक्रिया का इंतजार नहीं किया। उन्होंने तुरंत अपनी जेब से ₹4,500 निकालकर किशोर को सौंप दिए और कहा, “जाओ, पहले फ्रिज खरीदो और अपना इलाज जारी रखो।” इसके साथ ही उन्होंने किशोर को भरोसा दिलाया कि भविष्य में भी किसी मदद की जरूरत हो, तो वह बिना झिझक उनके पास आ सकता है।
संवेदना से बदल जाती है कुर्सी की परिभाषा
डीएम डॉ. इंद्रमणि त्रिपाठी का यह कदम इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने सिर्फ दवा दिलाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं मानी, बल्कि मरीज के सामने आ रही व्यावहारिक समस्या को भी समझा। मैनपुरी में अपनी पारदर्शी और जनता से जुड़ी कार्यशैली के लिए पहचाने जाने वाले डॉ. त्रिपाठी की इस पहल की हर तरफ सराहना हो रही है।
अनाथ किशोर के लिए यह केवल ₹4,500 की आर्थिक मदद नहीं, बल्कि इस बात का अटूट विश्वास था कि मुश्किल वक्त में कोई ‘अपना’ उसका हाथ थामने के लिए मौजूद है।
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