अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के नए सर्वोच्च नेता के चुनाव को लेकर एक विवादित टिप्पणी की है। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि ईरान के भावी नेतृत्व को अमेरिका की मान्यता मिलना आवश्यक है, अन्यथा नए नेता के लिए सत्ता पर पकड़ बनाए रखना मुश्किल होगा।
व्हाइट हाउस से जारी एक कड़े बयान में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि यदि अमेरिका नए चुनाव को अपनी स्वीकृति नहीं देता है, तो ईरान के नए नेतृत्व के लिए लंबे समय तक टिक पाना संभव नहीं होगा।
ट्रंप के दावे और सैन्य रणनीति
राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान की सैन्य क्षमताओं पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों ने ईरान की नौसेना, वायु सेना और वायु रक्षा प्रणालियों को “तबाह” कर दिया है।
उन्होंने कहा:
“ईरान की योजना पूरे मध्य पूर्व पर नियंत्रण हासिल करने की थी, जिसे अमेरिका ने पूरी तरह नाकाम कर दिया है। अब उनके पास केवल बयानबाजी बची है।”
ट्रंप ने यह भी साफ किया कि ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य ऑपरेशनों को खत्म करने के लिए फिलहाल कोई ‘टाइम-टेबल’ निर्धारित नहीं है और स्थिति के अनुसार विशेष बलों (Special Forces) को तैनात किया जा सकता है।
‘यह हमारा आंतरिक मामला है’ – ईरान का पलटवार
ईरान की ओर से इन बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया आई है। ईरान के नए नेतृत्व और अली लारीजानी ने राष्ट्रपति ट्रंप की टिप्पणियों को सिरे से खारिज कर दिया है।
अली लारीजानी ने ट्रंप के बयान को “पिछड़ी हुई सोच” का उदाहरण बताते हुए कहा:
- संप्रभुता: नए नेता का चुनाव पूरी तरह से ईरानी जनता का आंतरिक मामला है और इसमें किसी भी विदेशी दखल की कोई जगह नहीं है।
- एकजुटता: लारीजानी के अनुसार, ईरान के भीतर भले ही कुछ मतभेद हों, लेकिन देश के हितों और सुरक्षा के सवाल पर पूरा नेतृत्व और जनता एकजुट है।
ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने भी एक बयान जारी कर कहा है कि ईरान को अस्थिर करने या उसे तोड़ने की कोई भी विदेशी कोशिश सफल नहीं होगी। परिषद ने अमेरिका और इसराइल के खिलाफ अपने कड़े रुख को दोहराया है।
मध्य पूर्व मामलों के जानकारों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान ईरान पर ‘अधिकतम दबाव’ (Maximum Pressure) की नीति का हिस्सा है। हालाँकि, इस तरह की बयानबाजी से तेहरान और वॉशिंगटन के बीच कूटनीतिक रास्ते और भी कठिन हो सकते हैं।
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