झारखंड के जन नायक पूर्व CM शिबू सोरेन का निधन, 81 साल की उम्र में ली आखिरी सांस, बेटे हेमंत ने कहा- आज मैं शून्य हो गया हूँ

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शिबू सोरेन ने 1970 के दशक में झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की और आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया। उन्होंने महाजनों और बाहरी लोगों (जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘दिकू’ कहा जाता था) के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई।

झारखंड के मुख्यमंत्री और शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया पर अपने भावुक संदेश में लिखा, “आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं…”

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का सोमवार को निधन हो गया। पिछले कई दिनों से वे दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। उनकी तबीयत लंबे समय से खराब चल रही थी और उन्हें किडनी से जुड़ी गंभीर समस्याओं के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

शिबू सोरेन, जिन्हें ‘दिशोम गुरु’ के नाम से भी जाना जाता था, झारखंड की राजनीति के एक मजबूत स्तंभ रहे हैं। उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के बैनर तले आदिवासियों के हक और अधिकार के लिए कड़ा संघर्ष किया। उनके निधन की खबर मिलते ही राज्यभर में शोक की लहर दौड़ गई।

झारखंड के मुख्यमंत्री और शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया पर अपने भावुक संदेश में लिखा, “आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं…”

सर गंगा राम अस्पताल की ओर से साझा की गई जानकारी के अनुसार, सुबह 8:56 बजे शिबू सोरेन का निधन हो गया। अस्पताल ने बताया कि लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। वे किडनी की बीमारी से पीड़ित थे और डेढ़ महीने पहले उन्हें स्ट्रोक भी हुआ था। पिछले एक महीने से वे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे।

शिबू सोरेन के निधन पर सभी ने शोक जताया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर लिखा,” झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक, शिबू सोरेन जी के निधन से मैं दुःखी हूँ। उन्होंने अलग झारखंड प्रदेश और वहाँ के लोगों के जल, जंगल, जमीन के अधिकार और आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के लिए आजीवन संघर्ष किया। मैंने उनके सुपुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री

@HemantSorenJMM जी से बात कर उनके परिवार और समर्थकों के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त की। दुःख की इस घड़ी में ईश्वर उन्हें संबल प्रदान करे।”

शिबू सोरेन का झारखंड के साथ एक गहरा नाता था। वे तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री बने और केंद्र में कोयला मंत्री के रूप में भी सेवा दी।

शिबू सोरेन का जन्म बिहार के हजारीबाग में 11 जनवरी 1944 को हुआ था। उन्हें दिशोम गुरु और गुरुजी के नाम से जाना जाता है। उन्होंने आदिवासियों के शोषण के खिलाफ लंबी संघर्ष की थी। 1977 में उन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा था, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, 1980 से वह लगातार कई बार सांसद चुने गए।

बिहार से अलग राज्य ‘झारखंड’ बनाने के आंदोलन में भी उनकी निर्णायक भूमिका रही है। वे तीन बार (2005, 2008, 2009) झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन एक बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके।

शिबू सोरेन का बचपन हजारीबाग जिले के नेमरा गाँव में बीता। उनके दादा चरण मांझी रामगढ़ राजा के टैक्स तहसीलदार थे, और परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था। लेकिन जब शिबू छोटे थे, उनके पिता सोबरन सोरेन की 27 नवंबर 1957 को लुकरैयाटांड़ गाँव के पास हत्या कर दी गई। यह हत्या गाँव के कुछ महाजनों के साथ जमीन विवाद के कारण हुई थी। उस समय शिबू अपने भाई के साथ गोला के आदिवासी छात्रावास में पढ़ रहे थे।

इस घटना ने उन्हें गहरी चोट पहुँचाई और महाजनी शोषण के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी। यहीं से उनके सामाजिक और राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई, जिसने उन्हें आदिवासी समुदाय का मसीहा बना दिया।

शिबू सोरेन ने 1970 के दशक में झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की और आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया। उन्होंने महाजनों और बाहरी लोगों (जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘दिकू’ कहा जाता था) के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई। उनके नेतृत्व में झारखंड अलग राज्य आंदोलन ने जोर पकड़ा, जिसके परिणामस्वरूप 2000 में झारखंड राज्य का गठन हुआ।

उनके इस योगदान के लिए उन्हें आदिवासी समुदाय ने ‘दिशोम गुरु’ (देश का गुरु) की उपाधि दी। उनके आंदोलन ने न केवल आदिवासियों को उनकी जमीन और सम्मान वापस दिलाने में मदद की, बल्कि उन्हें एक मजबूत राजनीतिक पहचान भी दी।


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