नई दिल्ली: रविवार को जंतर-मंतर पर आयोजित “संसद चलो मार्च” में हजारों प्रदर्शनकारी जुटे, जिन्होंने बढ़ते असंतोष और जवाबदेही की मांग का जोरदार सन्देश भेजा। यह सभा किसी बड़े राजनैतिक दल की रैली नहीं थी और न ही किसी सशक्त संगठनात्मक तंत्र का समन्वय इसमें मुख्या रूप से दिखा, फिर भी आंदोलन में युवा, छात्र, पेशेवर और नागरिकों की बड़ी भागीदारी रही।
प्रदर्शन का आरम्भ NEET‑UG परीक्षा पेपर लीक और उससे जुड़ी गड़बड़ियों के विरोध तथा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के रूप में हुआ था। समय के साथ यह विवाद व्यापक असंतोष में बदल गया और नारे केवल परीक्षा तक सीमित नहीं रहे; प्रदर्शनकारी सरकार से जवाबदेही और लोकतांत्रिक हिस्सेदारी की मांग कर रहे थे।
गर्म मौसम, सुरक्षा बलों की तैनाती और कई स्तर की बैरिकेडिंग के बावजूद हजारों लोग जंतर‑मंतर पहुंचे। दिल्ली पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियाँ संसद के आसपास के मार्गों पर तैनात रहीं और कुछ मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए, लेकिन यह भीड़ भी नहीं रुक सकी। कई प्रदर्शनकारियों ने ढोल‑नगाड़े बजाए, प्लेकार्ड लगाए और केंद्र सरकार व प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे लगाए। एक प्लेकार्ड पर लिखा था: “टैक्स दो, चंदा दो, और फेल एजुकेशन सिस्टम की बात पर चुप रहो।”
प्रदर्शन में शामिल कई लोग 20–30 वर्ष आयु वर्ग के रहे और इनमें से कई संगठित राजनीति से दूर बताए गए। दिल्ली यूनिवर्सिटी की एक छात्रा और अन्य प्रतिभागियों ने कहा कि यह केवल परीक्षा का मामला नहीं, बल्कि लोकतंत्र और भविष्य की नीति निर्धारण में युवाओं की भागीदारी का सवाल है। कुछ ने वांगचुक पर हुए निशानेबाज़ी और उन पर लगे आरोपों के खिलाफ समर्थन जताया। आईआईटी ग्रेजुएट्स के एक समूह ने वांगचुक के समर्थन में विरोध किया और कहा कि आलोचना करने वालों को देशद्रोही करार देना सही नहीं।
वांगचुक स्वयं इस आंदोलन के केंद्र में रहे। दिल्ली पुलिस ने उन्हें शनिवार सुबह जंतर‑मंतर से हटाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया था। उन्होंने अपना अनशन तभी खत्म किया जब उन्हें भरोसा दिया गया कि सांसद मॉनसून सत्र में यह मुद्दा उठाएंगे और सरकार इस पर ध्यान देगी। इसी के साथ, ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (आइसा) के तीन कार्यकर्ताओं ने विपक्षी नेताओं और नागरिक समाज के आग्रह पर अपनी 23 दिन लंबी भूख हड़ताल समाप्त कर दी।
प्रदर्शन के दौरान कुछ जगहों पर पुलिस ने भीड़ को तितर‑बितर करने के लिए आंसू गैस छोड़ी और लाठीचार्ज किया, लेकिन प्रदर्शनकारी डटे रहे और संसद के गेट तक पहुँचने का प्रयास जारी रखा। इस मार्च की विशेषता यह रही कि जमीन पर बड़े राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता अपेक्षाकृत कम दिखे; आंदोलन अधिकतर स्वतःस्फूर्त और नागरिक‑नेतृत्व में रहा। दिल्ली से बाहर भी कम से कम नौ शहरों — जिनमें मुंबई और हैदराबाद प्रमुख हैं — में वांगचुक और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के समर्थन में प्रदर्शन की जानकारी मिली।
राजनीतिक टिप्पणीकारों और कुछ सरकारी कश्मकश से जुड़े लोगों ने भीड़ की तादाद और युवा भागीदारी से आश्चर्य व्यक्त किया। विपक्षी दलों के लिए यह चुनौती है कि क्या वे इस गुस्से को संगठित राजनीतिक आन्दोलन में बदल पाते हैं या नहीं। आंदोलन की निरंतरता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार और संसद इस मुद्दे को किस तरह उठाते हैं और आगे की कार्रवाई क्या होती है।
रविवार के “संसद चलो” मार्च ने स्पष्ट कर दिया कि व्यापक जनता का गुस्सा अब भी सड़कों पर सामूहिक रूप से उभर सकता है। अगर छात्रों और युवाओं की चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसका राजनीतिक असर दीर्घकालिक भी हो सकता है।
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