मुंबई: अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित नई रिपोर्ट “Indian Coastal Region: Climate Projections 2021–2040” चेतावनी देती है कि भारत के लगभग 11,000 किलोमीटर लम्बे तटीय क्षेत्र में आने वाले वर्षों में तापमान, वर्षा और समुद्री परिस्थितियों में ऐसे बदलाव आ सकते हैं जो जीवन, आजीविका और पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित करेंगे। रिपोर्ट में 1960 के मानकों से तुलना करते हुए जिले-स्तर पर 2021–2040 के संभावित परिवर्तन दिखाने के लिए 25 × 25 किमी के हाई-रिज़ॉल्यूशन डेटा और CMIP6 मॉडल का उपयोग किया गया है।
लक्षित अवधि और विधि
रिपोर्ट निकट भविष्य (2021–2040) के जलवायु परिदृश्यों पर केन्द्रित है और क्षेत्रीय सटीकता बढ़ाने के लिए CMIP6 मॉडल के आउटपुट में बायस-सुधार (bias correction) लागू किए गए हैं। अध्ययन का उद्देश्य नीति-निर्माताओं, स्थानीय प्रशासन और समुद्री-तटीय समुदायों को जिले-स्तर के ठोस आंकड़े प्रदान कर अनुकूलन रणनीतियों को सक्षम बनाना है।
मुख्य निष्कर्ष
- औसत तापमान वृद्धि: भारत के औसत तापमान में लगभग 1.5°C की वृद्धि का अनुमान। करीब 40 तटीय जिलों में गर्मियों के मौसम के तापमान में लगभग 1°C तक की वृद्धि हो सकती है।
- वेट-बल्ब तापमान का जोखिम: तटीय केरल और तमिलनाडु में ग्रीष्मकालीन वेट-बल्ब तापमान खतरनाक स्तर तक पहुँच सकता है; 31°C वेट-बल्ब स्तर मानव स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक माना जाता है।
- एर्नाकुलम की गर्मी: एर्नाकुलम में गर्मियों के अधिकतम तापमान में सर्वाधिक वृद्धि (~1.3°C) का अनुमान है।
- मानसून तीव्रता में वृद्धि: तटीय महाराष्ट्र और गुजरात में मानसून की तीव्रता बढ़ने की आशंका है; मुंबई उपनगर में तेज बारिश की अवधि में लगभग 6 दिन की वृद्धि संभव है। सूरत में दक्षिण-पश्चिम मानसून में लगभग 23% और भावनगर में 24% तक वृद्धि देखी जा सकती है।
- समुद्र स्तर व कटाव: मध्य-पथ पर (SSP2-4.5) 2050 तक वैश्विक समुद्री सतह में ~15 सेंटीमीटर की वृद्धि का अनुमान है, जिससे तटीय कटाव और विस्थापन बढ़ सकता है।
- साइक्लोन जोखिम: समुद्री सतह के तापमान में दशक-दर-दशक वृद्धि (~0.27°C प्रति दशक) प्रचंड ट्रॉपिकल साइक्लोन की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ा सकती है।
- आजीविका और स्वास्थ्य प्रभाव: मछलियों के तट से दूर होने, अनपेक्षित बारिश से नमक बनाने और समुद्री उत्पाद सुखाने के पारंपरिक कामों पर प्रभाव, तथा सुंदरबन में बढ़ती खारापन के कारण स्वास्थ्य समस्याओं की रिपोर्ट शामिल हैं।
स्थानीय अभिव्यक्तियाँ और नीति संकेत
अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के सीईओ अनुराग बेहार ने कहा, “जलवायु परिवर्तन सुदूर भविष्य की चुनौती नहीं है; यह आज की वास्तविकता है। 2040 करीब आ चुका है और हमें बुनियादी ढांचे व प्रशासनिक नीतियों में बदलाव लाने की आवश्यकता है।” यूनिवर्सिटी की स्कूल ऑफ क्लाइमेट चेंज एंड सस्टेनेबिलिटी की डायरेक्टर हरिनी नगेन्द्र ने भी कहा कि रिपोर्ट दर्शाती है कि तटीय संकट बहुत स्थानीय और तत्काल है, इसलिए अनुकूलन के काम में तेजी आवश्यक है।
निहितार्थ
रिपोर्ट स्थानीय प्रशासन, शहरी योजनाकारों, तटीय समुदायों और नीतिनिर्माताओं के लिए जिले-स्तर पर तैयार किए गए आंकड़े उपलब्ध कराती है ताकि जोखिम-आधारित तैयारी, स्वास्थ्य व आजीविका समायोजन और तटीय संरक्षण नीतियाँ बनाई जा सकें। रिपोर्ट यह भी बताती है कि पारंपरिक आजीविका और स्थानीय ज्ञान प्रणालियों को सहेजने व उन्हें अनुकूलन रणनीतियों में शामिल करने की आवश्यकता है।
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