बासु चटर्जी: आम ज़िंदगी और मध्यमवर्ग का सिनेमा रचने वाला फ़िल्मकार

Date:

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फ़िल्मकारों ने बड़े-बड़े तमाशे रचे, कुछ ने पर्दे पर चमकते सितारे पैदा किए, तो कुछ ने ऐसी दुनिया बनाई जिसमें दर्शक ख़ुद को हूबहू देख सकें। बासु चटर्जी (बासु दा) इसी तीसरी क़िस्म के फ़िल्मकार थे। हाल ही में 4 जून को उनकी सालगिरह थी।

अजमेर से चलकर बंबई पहुँचे बासु दा ने हिंदुस्तानी सिनेमा के इतिहास में एक बिलकुल अलग रंग और सरोकार से समानांतर इतिहास (Parallel History) लिखने का काम किया। उनकी फ़िल्में इंसानी रिश्तों की परतों को बेहद ख़ूबसूरती से उधेड़ती और सिलती हैं।

बासु दा के सिनेमा की प्रमुख विशेषताएँ

  • आम आदमी ही हीरो था: उन्होंने किसी सुपरमैन को नहीं, बल्कि छोटी-छोटी ख़्वाहिशों के साथ जीने वाले आम आदमी को फ़िल्मों का हीरो बनाया ।
  • धीमी धुन सी ज़िंदगी: बासु चटर्जी की फ़िल्मों में ज़िंदगी किसी मेले की तरह शोरगुल वाली नहीं, बल्कि एक धीमी धुन की तरह सहज बहती है ।
  • आस-पास के किरदार: उनके किरदार हमारे और आपके जैसे ही हैं—शर्मीले नौजवान, कामकाजी लड़कियाँ, परेशान माँ-बाप और सपनों से भरे साधारण परिवार । यही वजह है कि उनकी फ़िल्में आज भी उतनी ही ताज़ा लगती हैं ।

यादगार फ़िल्में: मानवीय संवेदनाओं के अनूठे रंग

बासु दा ने हर सतह पर कामयाबी हासिल की। एक तरफ़ जहाँ उन्होंने ‘स्वामी’ जैसी फ़िल्म के लिए बेस्ट डायरेक्टर का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड जीता, वहीं ‘एक रुका हुआ फ़ैसला’ जैसी प्रयोगात्मक (Experimental) फ़िल्में भी बनाईं। आइए नज़र डालते हैं उनकी कुछ कालजयी फ़िल्मों पर:

1. रजनीगंधा (1974): यादों की ख़ुशबू और दिल की कशमकश

अगर बासु चटर्जी की पूरी फ़िल्मी दुनिया को किसी एक फ़िल्म में समेटना हो, तो वह ‘रजनीगंधा’ होगी। मन्नू भंडारी की मशहूर कहानी ‘यही सच है’ पर आधारित यह फ़िल्म किसी बड़े ड्रामे पर नहीं, बल्कि इंसानी दिल की उलझनों पर बनी है।

  • कहानी: एक पढ़ी-लिखी, आधुनिक और संवेदनशील स्त्री (विद्या सिन्हा द्वारा अभिनीत) जो अपने वर्तमान और अतीत के बीच झूल रही है।
  • ख़ासियत: सिनेमा बिना किसी विलेन और बिना शोर-शराबे के भी दिलों को छू सकता है, यह बासु दा ने साबित किया।
  • गीत का जादू: मुकेश की आवाज़ में गाया यह गीत पूरी फ़िल्म का सार है — “कई बार यूं भी देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है… मन दौड़ने लगता है, अन्जानी प्यास के पीछे, अन्जानी आस के पीछे…”

2. छोटी सी बात: झिझक का रोमांस

यह बासु चटर्जी की सबसे प्यारी फ़िल्मों में से एक है। अमोल पालेकर का किरदार ‘अरुण’ कोई बहादुर या फ़िल्मी अंदाज़ का आशिक़ नहीं है। वह एक आम युवक है जो अपनी पसंद की लड़की से बात करने में भी झिझकता है। यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है, क्योंकि दर्शक उसमें ख़ुद को देखते हैं। इसका गीत “ना जाने क्यों होता है ये ज़िंदगी के साथ…” आज भी मोहब्बत और तन्हाई के सबसे ख़ूबसूरत गीतों में शुमार है।

3. चितचोर: मासूमियत का जश्न

इस फ़िल्म में बासु दा ने गाँव, मोहब्बत और सादगी को इतनी ख़ूबसूरती से पेश किया कि यह भारतीय सिनेमा की क्लासिक फ़िल्म बन गई । रवीन्द्र जैन के संगीत ने इसे अमर बना दिया । जब “गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा…” की धुन बजती है, तो जैसे पूरा हिन्दुस्तान एक छोटे-से गाँव में सिमट आता है

4. बातों बातों में: मुंबई की लोकल ट्रेन में खिलती मोहब्बत

बासु चटर्जी ने मुंबई को सबसे ज़्यादा अपनेपन के साथ परदे पर दिखाया । इस फ़िल्म में मोहब्बत किसी वादी या पहाड़ों में नहीं, बल्कि मुंबई की लोकल ट्रेन के डिब्बों, भीड़, प्लेटफ़ॉर्म, चर्चगेट और बांद्रा की भागदौड़ के बीच जन्म लेती है । इसका गाना “उठे सबके कदम, तरा रम-पम-पम…” आज भी गुनगुनाया जाता है

5. खट्टा मीठा: परिवार की असली तस्वीर

यह फ़िल्म दिखाती है कि परिवार सिर्फ़ ख़ून के रिश्तों से नहीं, बल्कि मोहब्बत, समझौते और एक-दूसरे को अपनाने से बनता है। इसमें कोई बड़ा ड्रामा या आँसूओं का सैलाब नहीं है, बल्कि घरों की छोटी-छोटी नोकझोंक में छिपे बड़े किस्से हैं।

‘आम आदमी’ को दिया नया नायक

बासु चटर्जी ने हिन्दी सिनेमा को एक ऐसा नायक दिया जो लड़ता कम था और सोचता ज़्यादा था। वह नौकरी की फ़िक्र करता, प्रमोशन की उम्मीद रखता, शादी को लेकर परेशान रहता और मोहब्बत में झिझकता था। अमोल पालेकर इस आम आदमी के सिनेमा का सबसे जाना-पहचाना चेहरा बने। यह वह दौर था जब सिनेमा का हीरो आसमान से उतरा हुआ कोई जादुई इंसान नहीं, बल्कि हमारे पड़ोस में रहने वाला शख़्स लगने लगा था।

Sibtain Shahidi
लेखक्- सिबतैन शाहिदी

सिर्फ़ रोमांस नहीं, समाज का आईना भी

बासु दा सिर्फ़ हल्की-फुल्की फ़िल्में ही नहीं बनाते थे, बल्कि समाज की गहरी पड़ताल भी करते थे:

  • एक रुका हुआ फ़ैसला: इंसाफ़, पूर्वाग्रह और समाज की रूढ़िवादी मानसिकता पर गहरी चोट करती है।
  • कमला की मौत: मध्यवर्गीय समाज की दोहरी सोच को बेनक़ाब करती है।

उनकी फ़िल्मों में सनसनी फैलाने के लिए न तो हिंसा थी, न ही कोई चकाचौंध या भारी-भरकम फ़लसफ़ा। यही सहजता और कोमलता उन्हें सत्तर के दशक का सबसे बेहतरीन और सबसे कम विवादित फ़िल्मकार बनाती है।

निष्कर्ष: मामूली चीज़ों से जादू जगाने वाला हुनर

आज जब सिनेमा का एक बड़ा हिस्सा भव्यता, वीएफएक्स तकनीक और भारी बजट पर टिका हुआ है, तब बासु चटर्जी की फ़िल्में हमें याद दिलाती हैं कि एक अच्छी कहानी के लिए बड़े बजट की नहीं, बल्कि इंसानी एहसास की ज़रूरत होती है।

एक भूला हुआ ख़त, लोकल ट्रेन का सफ़र, किसी लड़की की धीमी मुस्कान या फूलों का एक छोटा-सा गुलदस्ता—बासु दा इन्हीं मामूली चीज़ों से परदे पर जादू पैदा कर देते थे । बहुत से फ़िल्मकारों ने दर्शकों का मनोरंजन किया होगा, लेकिन बासु चटर्जी ने आम दर्शकों को यह अनूठा एहसास दिलाया कि उनकी अपनी साधारण ज़िंदगी भी किसी फ़िल्म की ख़ूबसूरत कहानी बन सकती है । और यही किसी महान फ़िल्मकार की सबसे बड़ी कामयाबी है।

नोट- लेखक सिबतैन शाहिदी एक फिल्ममेकर (Filmmaker) और स्क्रीनराइटर (Screenwriter) हैं। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने निजी विचार हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Visual Stories

Popular

More like this
Related

जी7 शिखर सम्मेलन: अमेरिका और ईरान के बीच समझौते पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद

एवियन (फ्रांस): जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिका और...