दो पैन कार्ड मामला: 10 साल की सजा के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे आजम खान, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मांगे रामपुर कोर्ट के रिकॉर्ड

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लखनऊ: समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता मोहम्मद आजम खान के ‘दो पैन कार्ड’ से जुड़े विवाद ने एक बार फिर कानूनी और सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। रामपुर की अदालत द्वारा सजा की अवधि बढ़ाकर 10 साल किए जाने के फैसले को आजम खान ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी है। इस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अब उत्तर प्रदेश सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है।

यह अहम आदेश न्यायमूर्ति जय प्रकाश तिवारी की एकल पीठ ने मंगलवार को जारी किया। अदालत में आजम खान का पक्ष रखने के लिए देश के दिग्गज और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के साथ एन.आई. जाफरी, शाश्वत आनंद और अंकुर आजाद जैसी वकीलों की फौज उतरी। डिफेंस की दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे जुलाई 2026 के दूसरे सप्ताह में ‘फ्रेश केस’ के रूप में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने रामपुर की ट्रायल कोर्ट से इस मामले से जुड़े सभी मूल दस्तावेज (अभिलेख) और केस डायरी भी मंगवा ली है।

क्या है पूरा मामला और क्यों बढ़ी सजा?

यह पूरा विवाद विधानसभा चुनाव के नामांकन पत्रों में जमा किए गए पैन कार्ड विवरण में कथित हेरफेर और फर्जीवाड़े से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि आजम खान ने एक सोची-समझी साजिश के तहत दो अलग-अलग पैन कार्ड्स का इस्तेमाल किया। इसी शिकायत पर रामपुर में उनके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी (आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-बी) के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था।

ट्विस्ट तब आया जब रामपुर की विशेष एमपी/एमएलए कोर्ट ने पहले उन्हें दोषी पाते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी। लेकिन जब मामला अपील में गया, तो अपीलीय कोर्ट ने न सिर्फ दोषसिद्धि को बरकरार रखा, बल्कि राज्य सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए आईपीसी की धारा 467 के तहत उनकी सजा को 7 साल से बढ़ाकर सीधे 10 साल कर दिया, जिसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया।

हाईकोर्ट में आजम खान की दलीलें

आजम खान की ओर से दाखिल याचिका में निचली अदालत और अपीलीय अदालत, दोनों के फैसलों को कटघरे में खड़ा किया गया है। याचिका में दावा किया गया है कि:

  • सजा को 7 साल से बढ़ाकर 10 साल करने का फैसला कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है।
  • अदालतों के निष्कर्षों में कई तथ्यात्मक कमियां हैं, जिसके आधार पर यह सजा खारिज होनी चाहिए।

आगे क्या? अब इस हाई-प्रोफाइल मामले का पूरा दारोमदार जुलाई में होने वाली अगली सुनवाई पर टिक गया है। कोर्ट के कड़े रुख के बाद अब हर किसी की नजरें इस बात पर हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार हाईकोर्ट में क्या जवाब दाखिल करती है।

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