मुहर्रम मुबारक नहीं, आत्ममंथन का महीना; कर्बला सत्य और सत्ता के संघर्ष का शाश्वत प्रतीक: मज़ाहिर रुहेला पठान

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यौमे आशूरा की फ़ज़ीलत
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मुरादाबाद: मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक मज़ाहिर रुहेला पठान ने राष्ट्र के नाम अपने एक विशेष संबोधन में मुहर्रम के महत्व और इसकी संवेदनशीलता को रेखांकित किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुहर्रम का महीना कोई उत्सव मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन और गहरे चिंतन का समय है।

पठान ने कर्बला की ऐतिहासिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा, “कर्बला केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि सत्य और सत्ता के संघर्ष का शाश्वत प्रतीक है। जब हजरत इमाम हुसैन ने अन्याय के सामने सिर झुकाने के बजाय अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया, तब उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि नैतिकता की विजय संख्या, शक्ति या तलवार से नहीं, बल्कि सत्य के प्रति अडिग प्रतिबद्धता से होती है।”

मुहर्रम के दौरान “मुबारक” शब्द के इस्तेमाल पर अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया की हर सभ्यता में शोक के क्षणों का सम्मान किया जाता है। जिस माह को करोड़ों लोग कर्बला के शहीदों की याद में ग़म, चिंतन और श्रद्धा के साथ बिताते हैं, उसे “मुबारक” कहना उनके ऐतिहासिक और आध्यात्मिक अनुभव की संवेदनशीलता को अनदेखा करने जैसा है।

अपने संदेश के अंत में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक ने कहा कि कर्बला हमें सिखाती है कि कभी-कभी इतिहास में सबसे बड़ी जीत रणभूमि में नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर हासिल की जाती है। यही कारण है कि सदियों बाद भी यज़ीद केवल क्रूर सत्ता का प्रतीक बनकर रह गया है, जबकि हजरत इमाम हुसैन आज भी हर इंसान की अंतरात्मा की आवाज़ हैं। उन्होंने मशहूर पंक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि “शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन” केवल एक शेर नहीं, बल्कि इस शाश्वत सत्य की घोषणा है कि नैतिक साहस हमेशा समय और सत्ता से बड़ा होता है।