रोज़ा: रोज़े के दौरान लार और रक्त निगलना

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क्या रोज़ा रखते समय लार और खून निगलने से रोज़ा टूट जाएगा? क्या रोज़े के दौरान लार निगलना जायज़ है?

सवाल: यदि लार और रक्त आपस में मिल जाएं और लार की प्रधानता हो जाए, और व्यक्ति इस लार और रक्त को निगल ले, तो क्या रोज़ा बरकरार रहेगा या नहीं?

जवाब: अगर लार में खून मिला हुआ हो और खून की मात्रा ज्यादा न हो और मुंह में जाने के बाद वापस गले में चला जाए तो इससे रोजा नहीं टूटेगा। यदि लार में रक्त मिला हो और रक्त की मात्रा अधिक हो तथा वह गले से नीचे बह जाए तो इससे रोज़ा टूट जाता है।

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सवाल: क्या रोज़े के दौरान लार निगलना जायज़ है? क्या इससे रोज़ा टूट जाता है? मैंने देखा है कि रमज़ान में बहुत से लोग अपनी लार निगलने से बचने के लिए बहुत ज़्यादा थूकते हैं, ख़ास तौर पर वुज़ू के दौरान कुल्ला करने के बाद।

जवाब: अल्लाह के नाम से, जो अत्यन्त दयावान, अत्यन्त कृपालु है।

मुस्लिम विधिवेत्ताओं (फ़ुक़ाहा) के बीच कमोबेश इस बात पर पूरी सहमति है कि अपनी लार निगलने से रोज़ा टूटता नहीं है, भले ही वुज़ू के दौरान मुँह धोने के बाद भी ऐसा हो, क्योंकि इससे बचना मुश्किल है। शरिया के पवित्र स्रोतों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह संकेत दे कि अपनी लार निगलने से रोज़ा टूटता है।

इसके विपरीत, इमाम अल-बुखारी (अल्लाह उनसे प्रसन्न हो) ने अध्याय-शीर्षक ‘एक उपवास करने वाला व्यक्ति सूखे और नम सिवाक का उपयोग करता है’ के अंतर्गत वर्णन किया है: ‘आयशा (अल्लाह उनसे प्रसन्न हो) ने कहा, ‘अल्लाह के रसूल (अल्लाह उन पर आशीर्वाद और शांति प्रदान करें) ने कहा, ‘यह (यानी सिवाक) मुंह के लिए शुद्धि और अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने का एक तरीका है। अता और क़तादा (अल्लाह दोनों से प्रसन्न हो) ने कहा, ‘व्यक्ति अपनी लार को निगल सकता है।’ (सहीह अल-बुखारी 2/682)

प्रसिद्ध हनफ़ी फ़िक़्ह संदर्भ पुस्तक, बदाई अल-सनाई में कहा गया है :

‘इसी तरह कुल्ली करने के बाद मुंह में जो नमी रह जाती है और लार में मिल जाती है, उसे निगल लेने से या मुंह में जमा लार को निगल लेने से भी रोज़ा टूटता नहीं है, क्योंकि हमने जो बताया है, उसके कारण [अर्थात् इससे बचना प्रायः कठिन होता है]।’ (बदाई अल-सनाई 2/90)

इमाम इब्न कुदामा (अल्लाह उन पर रहम करे) ने अपनी प्रसिद्ध हंबली और तुलनात्मक फ़िक़्ह, अल-मुगनी में कहा है :

‘जिस चीज से बचा नहीं जा सकता, जैसे कि अपनी लार निगलना, उससे रोज़ा टूटता नहीं, क्योंकि उससे बचना मुश्किल है… यहां तक ​​कि अगर कोई व्यक्ति लार इकट्ठा होने देता है और फिर उसे जानबूझकर निगल लेता है, तो भी उसका रोज़ा टूटता नहीं।’ (अल-मुगनी, 3/39-40)

इस प्रकार, रोज़े के दौरान अपनी लार निगलने में कोई बुराई नहीं है। व्यक्ति को खुद के लिए मुश्किलें खड़ी करने से बचना चाहिए और इसलिए रमज़ान के दौरान ज़्यादा थूकने की ज़रूरत नहीं है। थूकने से मुंह सूख जाता है और प्यास लगती है, जिससे अनावश्यक परेशानी होती है।

दरअसल, अगर किसी की लार में कुछ और मिला हो, जैसे मसूड़ों से निकला खून या मुंह में बचा हुआ खाना, तो जानबूझकर निगलने पर रोज़ा टूट जाता है।

अंत में, हालांकि अपनी लार निगलने से रोज़ा टूटता नहीं है, फिर भी प्यास बुझाने के लिए जानबूझ कर अपनी लार को मुंह में इकट्ठा करना और फिर उसे निगलना नापसंद (मकरूह) है। (मरक़ी अल-फ़लाह शरह नूर अल-इदा, पृ: 680)

और अल्लाह सबसे अच्छा जानता है।

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