नई दिल्ली: उर्दू भाषा के विकास के लिए समर्पित देश की शीर्ष संस्था, राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद (NCPUL), इन दिनों गंभीर प्रशासनिक संकट से जूझ रही है। उर्दू डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (UDO) ने इस ‘प्रशासनिक लकवे’ (Administrative Paralysis) को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को एक कड़ा पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
क्यों सुर्खियों में है NCPUL का मुद्दा?
UDO के अध्यक्ष डॉ. सैयद अहमद खान द्वारा भेजे गए इस पत्र में दावा किया गया है कि फरवरी 2024 में परिषद के पुनर्गठन के बावजूद, संस्थागत कामकाज पूरी तरह ठप पड़ा है। पत्र में मुख्य रूप से तीन बड़े संकटों को रेखांकित किया गया है जो उर्दू विद्वानों और लेखकों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।
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खबर के मुख्य बिंदु:
- उपाध्यक्ष का पद रिक्त: पिछले दो वर्षों से परिषद में उपाध्यक्ष (Vice-Chairman) का पद खाली है। नेतृत्व की कमी के कारण नीतिगत निर्णय और कार्यकारी कामकाज अधर में लटके हैं।
- वित्त समिति (Finance Committee) का अभाव: पत्र के अनुसार, अनिवार्य वित्त समिति को अब तक अधिसूचित नहीं किया गया है। इसके बिना न तो वित्तीय मंजूरी दी जा सकती है और न ही किसी ग्रांट (Grant) का वितरण हो पा रहा है।
- प्रस्तावों का अंबार: कार्यकारी बोर्ड की बैठकें न होने के कारण देश भर के लेखकों, प्रकाशकों और NGO के सैकड़ों शैक्षणिक प्रस्ताव महीनों से धूल फांक रहे हैं।
“एक संस्था जिसे उर्दू भाषा और साहित्य को बढ़ावा देने का काम सौंपा गया है, वह इस तरह निष्क्रिय नहीं रह सकती। इससे विद्वानों और लाभार्थियों को अपूरणीय क्षति हो रही है।” – डॉ. सैयद अहमद खान, अध्यक्ष, UDO
PMO से क्या हैं मुख्य मांगें?
डॉ. खान ने प्रधानमंत्री कार्यालय से अपील की है कि वह शिक्षा मंत्रालय को निम्नलिखित निर्देश जारी करें:
- रिक्त पड़े उपाध्यक्ष के पद को तुरंत भरा जाए।
- वित्त समिति का गठन और उसकी अधिसूचना जल्द जारी की जाए।
- लंबित प्रस्तावों के निपटारे के लिए कार्यकारी बोर्ड की बैठक समयबद्ध तरीके से बुलाई जाए।
उर्दू डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन का मानना है कि NCPUL की यह निष्क्रियता न केवल संस्था के उद्देश्यों को विफल कर रही है, बल्कि भारत की भाषाई विरासत के संरक्षण के प्रति सरकारी प्रतिबद्धता को भी कमजोर कर रही है। अब सबकी नजरें PMO के रुख पर टिकी हैं।
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